मंगल पांडे

पूरा नाम मंगल पांडे
जन्म 19 जुलाई, 1827 ई.
जन्म भूमि नगवा गाँव, बलिया ज़िला अथवा सुरहुरपुर ग्राम, फ़ैज़ाबाद ज़िला, उत्तर प्रदेश[1]
मृत्यु 8 अप्रैल, 1857 ई.
मृत्यु स्थान बैरकपुर, कलकत्ता (अब कोलकाता)
मृत्यु कारण फाँसी
अभिभावक पिता- दिवाकर पांडे, माता- अभय रानी
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि स्वतन्त्रता सेनानी
धर्म हिन्दू
आंदोलन भारतीय स्वाधीनता संग्राम, 1857
प्रमुख संगठन जंग-ए-आज़ादी

अन्य जानकारी 8 अप्रैल का दिन मंगल पांडे की फाँसी के लिए निश्चित किया गया। बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए। अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया।

मंगल पांडे अथवा मंगल पान्डेय (अंग्रेज़ी: Mungal Pandey अथवा Mangal Pandey, जन्म: 19 जुलाई, 1827; मृत्यु: 8 अप्रैल, 1857) का नाम ‘भारतीय स्वाधीनता संग्राम‘ में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है, जिनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनीका शासन बुरी तरह हिल गया था। मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे। ब्रह्मदेश (बर्मा {वर्तमान म्यांमार}) पर विजय तथा सिक्ख युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अंग्रेज़ों ने भारतवर्ष पर निष्कंटक राज्य करने के सपने देखें होंगे; पर उन्हें क्या पता था कि सन 1857 का वर्ष उनकी आशाओं पर तुषारपात का वर्ष सिद्ध होगा।

जन्म और परिवार

क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के नगवा गाँव में हुआ था। कुछ सन्दर्भों में इनका जन्म स्थल फ़ैज़ाबाद ज़िले की अकबरपुर तहसील के सुरहुरपुर ग्राम में बताया गया है।[1] इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे तथा माता का नाम श्रीमती अभय रानी था। वे कोलकाता (भूतपूर्व कलकत्ता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना के 1446 नम्बर के सिपाही थे। भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के संग्रामकी शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी।

जंग-ए-आज़ादी

भारतीय इतिहास‘ में 29 मार्च, 1857 का दिन अंग्रेज़ों के लिए दुर्भाग्य के दिन के रूप में उदित हुआ। पाँचवी कंपनी की चौंतीसवीं रेजीमेंट का 1446 नं. का सिपाही वीरवर मंगल पांडे अंग्रेज़ों के लिए प्रलय-सूर्य के समान निकला। बैरकपुर की संचलन भूमि में प्रलयवीर मंगल पांडे का रणघोष गूँज उठा-

“बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।”

मंगल पांडे के बदले हुए तेवर देखकर अंग्रेज़ सारजेंट मेजर ह्यूसन उसने पथ को अवरुद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस विद्रोही को उसकी उद्दंडता का पुरस्कार देना चाहा। अपनी कड़कती आवाज़ में उसने मंगल पांडे को खड़ा रहने का आदेश दिया। वीर मंगल पांडे के अरमान मचल उठे। वह शिवशंकर की भाँति सन्नद्ध होकर रक्तगंगा का आह्वान करने लगा। उसकी सबल बाहुओं ने बंदूक तान ली। उसकी सधी हुई उँगलियों ने बंदूक का घोड़ा अपनी ओर खींचा और घुड़ड़ घूँsss का तीव्र स्वर घहरा उठा। मेजर ह्यसन घायल कबूतर की भाँति भूमि पर तड़प रहा था। उसका रक्त भारत की धूल चाट रहा था। 1857 के क्रांतिकारी ने एक फिरंगी की बलि ले ली थी। विप्लव महायज्ञ के पुरोधा मंगल पांडे की बंदूक पहला ‘स्वारा’ बोल चुकी थी। स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी को दस्यु-देह की समिधा अर्पित हो चुकी थी।

खबरदार, जो कोई आगे बढ़ा! आज हम तुम्हारे अपवित्र हाथों को ब्राह्मणकी पवित्र देह का स्पर्श नहीं करने देंगे।
ह्यसन को धराशायी हुआ देख लेफ्टिनेंट बॉब वहाँ जा पहुँचा। उस अश्वारूढ़ गोरे ने मंगल पांडे को घेरना चाहा। पहला ग्रास खाकर मंगल पांडे की बंदूक की भूख भड़क उठी थी। उसने दूसरी बार मुँह खोला और लेफ्टिनेंट बॉब घोड़े सहित भू-लुंठित होता दिखाई दिया। गिरकर भी बॉब ने अपनी पिस्तौल मंगल पांडे की ओर सीधी करके गोली चला दी। विद्युत गति से वीर मंगल पांडे गोली का वार बचा गये और बॉब खिसियाकर रह गया। अपनी पिस्तौल को मुँह की खाती हुई देख बॉब ने अपनी तलवार खींच ली और वह मंगल पांडे पर टूट पड़ा। मंगल पांडे भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। बॉब ने मंगल पांडे पर प्रहार करने के लिए तलवार तानी ही थी कि मंगल पांडे की तलवार का भरपूर हाथ उस पर ऐसा पड़ा कि बॉब का कंधा और तलवार वाला हाथ जड़ से कटकर अलग जा गिरा। एक बलि मंगल पांडे की बंदूक ले चुकी थी और दूसरी उसकी तलवार ने ले ली।

लेफ्टिनेंट बॉब को गिरा हुआ देख एक दूसरा अंग्रेज़ मंगल पांडे की ओर बढ़ा ही था कि मंगल पांडे के साथी भारतीय सैनिक ने अपनी बंदूक डंडे की भाँति उस अंग्रेज़ की खोपड़ी पर दे मारी। अंग्रेज़ की खोपड़ी खुल गई। अपने आदमियों को गिरते हुए देख कर्नल व्हीलर मंगल पांडे की ओर बढ़ा; पर सभी क्रुद्ध भारतीय सिंह गर्जना कर उठे-

“खबरदार, जो कोई आगे बढ़ा! आज हम तुम्हारे अपवित्र हाथों को ब्राह्मण की पवित्र देह का स्पर्श नहीं करने देंगे।”

कर्नल व्हीलर जैसा आया था वैसा ही लौट गया। इस सारे कांड की सूचना अपने जनरल को देकर, अंग्रेज़ी सेना को बटोरकर ले आना उसने अपना धर्म समझा। जंग-ए-आज़ादी के पहले सेनानी मंगल पांडे ने 1857 में ऐसी चिंगारी भड़काई, जिससे दिल्ली से लेकर लंदन तक की ब्रिटिश हुकूमत हिल गई।

नारा ‘मारो फिरंगी को’

“मारो फिरंगी को” यह प्रसिद्ध नारा भारत की स्वाधीनता के लिए सर्वप्रथम आवाज़ उठाने वाले क्रांतिकारी मंगल पांडे की जुबां से 1857 की क्रांति के समय निकला था। भारत की आज़ादी के लिए क्रांति का आगाज़ 31 मई, 1857 को होना तय हुआ था, परन्तु यह दो माह पूर्व 29 मार्च, 1857 को ही आरम्भ हो गई। मंगल पांडे को आज़ादी का सर्वप्रथम क्रान्तिकारी माना जाता है। ‘फिरंगी’ अर्थात् ‘अंग्रेज़ या ब्रिटिश जो उस समय देश को गुलाम बनाए हुए थे, को क्रांतिकारियों व भारतियों द्वारा फिरंगी नाम से पुकारा जाता था। गुलाम जनता तथा सैनिकों के हृदय में क्रांति की जल रही आग को धधकाने के लिए व लड़कर आज़ादी लेने की इच्छा को दर्शाने के लिए यह नारा मंगल पांडे द्वारा गुंजाया गया था।

अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी

वीर मंगल पांडे ने अपने कर्तव्य की पूर्ति कर दी थी। शत्रु के रक्त से भारतभूमि का तर्पण किया था। मातृभूमि की स्वाधीनता जैसे महत कार्य के लिए अपनी रक्तांजलि देना भी अपना पावन कर्तव्य समझा। मंगल पांडे ने अपनी बंदूक अपनी छाती से अड़ाकर गोली छोड़ दी। गोली छाती में सीधी न जाती हुई पसली की तरफ फिसल गई और घायल मंगल पांडे अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी बना लिये गये। अंगेज़ों ने भरसक प्रयत्न किया कि वे मंगल पांडे से क्रांति योजना के विषय में उसके साथियों के नाम-पते पूछ सकें; पर वह मंगल पांडे थे, जिनका मुँह अपने साथियों को फँसाने के लिए खुला ही नहीं

बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।

कारतूस घटना

1857 के विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ था। सिपाहियों को 1853 में एनफ़ील्ड बंदूक दी गयी थीं, जो कि 0.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली का प्रयोग किया गया था, परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारूद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस में डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी, जो कि उसे नमी अर्थात् पानी की सीलन से बचाती थी।

सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। यह हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों दोनों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध था। अंग्रेज अफ़सरों ने इसे अफवाह बताया और सुझाव दिया कि सिपाही नये कारतूस बनायें, जिसमें बकरे या मधुमक्क्खी की चर्बी प्रयोग की जाये। इस सुझाव ने सिपाहियों के बीच फ़ैली इस अफवाह को और मज़बूत कर दिया। दूसरा सुझाव यह दिया गया कि सिपाही कारतूस को दांतों से काटने की बजाय हाथों से खोलें। परंतु सिपाहियों ने इसे ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वे कभी भी नयी कवायद को भूल सकते हैं और दांतों से कारतूस को काट सकते हैं। तत्कालीन अंग्रेज अफ़सर प्रमुख (भारत) जार्ज एनसन ने अपने अफ़सरों की सलाह को दरकिनार हुए इस कवायद और नयी बंदूक से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने से मना कर दिया।[3]

29 मार्च सन् 1857 को नए कारतूस को प्रयोग करवाया गया, मंगल पण्डे ने आज्ञा मानने से मना कर दिया और धोखे से धर्म को भ्रष्ट करने की कोशिश के ख़िलाफ़ उन्हें भला-बुरा कहा, इस पर अंग्रेज अफ़सर ने सेना को हुकम दिया कि उसे गिरफ्तार किया जाये, सेना ने हुक्म नहीं माना। पलटन के सार्जेंट हडसन स्वंय मंगल पांडे को पकड़ने आगे बढ़ा तो, पांडे ने उसे गोली मार दी, तब लेफ्टीनेंट बल आगे बढ़ा तो उसे भी पांडे ने गोली मार दी। घटनास्थल पर मौजूद अन्य अंग्रेज़ सिपाहियों नें मंगल पांडे को घायल कर पकड़ लिया। उन्होंने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान किया। किन्तु उन्होंने उनका साथ नहीं दिया। उन पर मुक़दमा (कोर्ट मार्शल) चलाकर 6 अप्रैल, 1857 को मौत की सज़ा सुना दी गई।

निधन

फ़ौजी अदालत ने न्याय का नाटक रचा और फैसला सुना दिया गया। 8 अप्रैल का दिन मंगल पांडे की फाँसी के लिए निश्चित किया गया। बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया। भारत के एक वीर पुत्र ने आज़ादी के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वीर मंगल पांडे के पवित्र प्राण-हव्य को पाकर स्वातंत्र्य यज्ञ की लपटें भड़क उठीं। क्रांति की ये लपलपाती हुई लपटें फिरंगियों को लील जाने के लिए चारों ओर फैलने लगीं।

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आखिर भारत को 15 अगस्त के दिन ही क्‍यों मिली आजादी?

भारत हर साल आजादी का जश्न 15 अगस्त को मनाता है. स्वतंत्रता दिवस (Indian Independence Day) देश भर में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. स्वतंत्रता दिवस (Indian Independence Day) पर हर साल भारत के प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहराते हैं. 15 अगस्त (15 August) 1947 को अंग्रेजों ने देश के शासन की कमान को भारीतयों को सौंप कर देश को स्वतंत्रत घोषित किया था. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है भारत की आजादी () के लिए 15 अगस्त की तारीख ही क्यों चुनी गई थी? दरहसल, ब्रिटिश संसद ने लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) को 30 जून 1948 तक भारत की सत्‍ता भारतीय लोगों को ट्रांसफर करने का अधिकार दिया था. लॉर्ड माउंटबेटन को साल 1947 में भारत के आखिरी वायसराय के तौर पर नियुक्त किया गया था. माउंटबेटन ने ही भारत की आजादी (India Independence) के लिए 15 अगस्त की तारीख चुनी थी.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सी राजगोपालाचारी (C Rajagopalachari) के सुझाव पर माउंटबेटन ने भारत की आजादी के लिए 15 ्अगस्त (15 August) की तारीख चुनी. सी राजगोपालाचारी ने लॉर्ड माउंटबेटन को कहा था कि अगर 30 जून 1948 तक इंतजार किया गया तो हस्तांतरित करने के लिए कोई सत्ता नहीं बचेगी. ऐसे में माउंटबेटन ने 15 अगस्त को भारत की स्वतंत्रता के लिए चुना. इसके बाद ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में इंडियन इंडिपेंडेंस बिल (Indian Independence Bill) 4 जुलाई 1947 को पेश किया गया. इस बिल में भारत के बंटवारे और पाकिस्तान के बनाए जाने का प्रस्ताव रखा गया था. यह बिल 18 जुलाई 1947 को स्वीकारा गया और 14 अगस्त को बंटवारे के बाद 15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि 12 बजे भारत की आजादी (Indian Independence) की घोषणा की गई.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 15 अगस्त (15 August) को आजादी का दिन चुनना माउंटबेटन का निजी फैसला था. माउंटबेटन लोगों को यह दिखाना चाहता था कि सब कुछ उसके ही नियंत्रण में है. माउंटबेटन 15 अगस्त की तारीख को शुभ मानता था इसीलिए उसने भारत की आजादी के लिए ये तारीख चुनी थी. 15 अगस्त का दिन माउंटबेटन के हिसाब से शुभ था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के समय 15 अगस्त, 1945 को जापानी आर्मी ने आत्मसमर्पण किया था और उस समय लॉर्ड माउंटबेटन अलाइड फ़ोर्सेज़ का कमांडर था.

अभिनव बिंद्रा

अभिनव बिंद्रा भारतीय राइफल शूटर हैं, जिन्होंने ओलम्पिक खेलों में भारत को पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रचा

संक्षिप्त जीवनी Brief Biographay

अभिनव बिंद्रा भारत को ओलंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाने वाले पहले खिलाड़ी हैं. अभिनव ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक जीत कर यह इतिहास रचा. निशानेबाजी के साथ-साथ खानदानी व्यापार संभालने वाले अभिनव ने भारत को 1980 के 28 साल बाद ओलंपिक में पहला स्वर्ण पदक दिलाया. इससे पहले, 1980 ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने अंतिम बार स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया था. अभिनव पहले ऐसे निशानेबाज भी हैं, जिनके नाम एक ही समय पर विश्व खिताब और ओलंपिक स्वर्ण पदक दोनों रहे. 2008 ओलंपिक से पहले उन्होंने 2006 में हुई आईएसएसएफ विश्व निशानेबाजी चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीता था. ओलंपिक के बाद बिंद्रा ने 2014 ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीतने का कारनामा किया. मई, 2016 में भारतीय ओलंपिक संघ ने बिंद्रा को रियो डी जिनेरियो ओलंपिक के लिए भारत में गुडविल एम्बेसडर भी नियुक्त किया था. रियो ओलंपिक में बिंद्रा 10 मीटर एयर राइफल स्पर्द्धा में शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद चौथे स्थान पर रहते हुए पदक से चूक गए. इसके तुरंत बाद ही 5 सितम्बर, 2016 को बिंद्रा ने निशानेबाजी को अलविदा कह दिया.

अभिनव बिंद्रा का आरम्भिक जीवन एवं शिक्षा Early Life & Education

28 सितम्बर, 1982 को जन्मे अभिनव बिंद्रा के पिता का नाम अपजित बिंद्रा और मां बबली बिंद्रा है. पंजाबी परिवार में जन्मे अभिनव बिंद्रा की स्कूली शिक्षा दून स्कूल से हुई, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए वह चंडीगढ़ के सेंट स्टीफंस कॉलेज चले गए. वर्ष 2000 में उन्होंने स्टीफंस कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की. दून स्कूल में ही बिंद्रा ने निशानेबाजी सीखना शुरू किया. बेटे की लगन को देखते हुए अपजित बिंद्रा ने पटियाला में अपने घर में ही अभिनव के लिए एक इंडोर शूटिंग रेंज स्थापित कर दी. अभिनव के मेंटोर डॉ. अमित भट्टाचार्य हैं जो कि करियर की शुरुआत से ही उनके साथ जुड़े हुए थे. लेकिन अभिनव के अंदर छिपी प्रतिभा को उनके पहले कोच रहे लेफ्टिनेंट कर्नल ढिल्लन ने पहचाना.

अपनी लगन और मेहनत के दम पर ही अभिनव वर्ष 2000 में सिडनी में हुए ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने में सफल रहे. वह ओलंपिक में उतरने वाले सबसे युवा भारतीय खिलाड़ी बने. अभिनव ने बाद में स्विट्जरलैंड की ग्रेब्रिएला भुलमान से भी ट्रेनिंग ली, जो कि खुद पांच बार की ओलंपियन थीं. ओलंपिक से पहले बिंद्रा ने उनसे जर्मनी में ट्रेनिंग ली थी. सिडनी ओलंपिक में अभिनव ने 590 अंक अर्जित किए और क्वालीफाइंग राउंड में 11वें स्थान पर रह कर होड़ से बाहर हो गए. फाइनल राउंड में शीर्ष आठ निशानेबाज ही हिस्सा लेते हैं.

अभिनव बिंद्रा का खेल करिअर Sports Career of Abhinav Bindra

अभिनव बिंद्रा ने15 साल की उम्र में अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत करने के बाद दो साल में ही अपने प्रदर्शन से सबका दिल जीत लिया. अंतरराष्ट्रीय पदार्पण के दो साल के भीतर ही उन्हें अर्जुन अवार्ड और फिर अगले ही साल देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड से नवाजा गया. बिंद्रा का पहला अंतरराष्ट्रीय पदक 2001 में आया, जब उन्होंने म्यूनिख में हुए विश्व कप में कांस्य पदक जीता. उस टूर्नामेंट में उन्होंने 600 में 597 अंक जुटाकर जूनियर विश्व रिकॉर्ड बनाया.

वर्ष 2001 बिंद्रा के करियर के लिए बेहद यादगार रहा, जब उन्होंने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में छह स्वर्ण पदक जीते. 2002 में मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलों में बिंद्रा ने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्द्धा के युगल वर्ग में स्वर्ण पदक और व्यक्तिगत वर्ग में रजत पदक जीता था. 2004 एथेंस ओलंपिक में बिंद्रा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए क्वालीफाइंग राउंड में 597 अंक अर्जित कर ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ा. क्वालीफाइंग राउंड में तीसरे स्थान पर रहे बिंद्रा हालांकि फाइनल में कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर सके और पदक से चूक गए. फाइनल राउंड में क्वान झाउ और ली जी ने क्रमश: 599 व 598 अंक जुटा बिंद्रा के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया. वहीं बिंद्रा 97.6 अंक लेकर आठ निशानेबाजों में सबसे अंतिम पायदान पर रहे. आठ निशानेबाजों में बिंद्रा ही थे जो कि 100 से भी कम अंक हासिल कर पाए थे.

अभिनव बिंद्रा के शूटिंग करियर का स्वर्णिम समय Golden Period of Abhinav’s Shooting Career

बिंद्रा के करियर का सुनहरा दौर वर्ष 2006 से शुरू हुआ. 24 जुलाई, 2006 को अभिनव ने जागरेब में हुई आईएसएसएफ विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीत इतिहास रचा. वह विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय निशानेबाज बने. उनसे पहले 1962 में डॉ. करणी सिंह ने विश्व चैम्पियनशिप में रजत पदक हासिल किया था. इसी साल मेलबर्न में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में बिंद्रा ने टीम स्पद्र्धा में स्वर्ण पदक जीता, जबकि व्यक्तिगत स्पद्र्धा में वह कांस्य पदक ही जीत पाए.

2006 में दोहा एशियाई खेलों में हालांकि अभिनव पीठ में चोट के चलते हिस्सा नहीं ले पाए थे. उनकी चोट काफी गंभीर थी, करीब एक साल तक अभिनव रेंज से बाहर रहे वह निशाना साधना तो दूर राइफल उठाने तक की स्थिति में नहीं थे. लेकिन उन्होंने एक साल बाद वापसी की और 2008 बीजिंग ओलंपिक की तैयारी शुरू की. विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही अभिनव ने ओलंपिक कोटा हासिल कर लिया था.

अभिनव बिंद्रा का ओलम्पिक स्वर्ण पदक Abhinav Bindra’s Olympic Gold Medal

चीन के बीजिंग में हुए 2008 ओलंपिक में अभिनव ने वो कर दिखाया जो उससे पहले तक कोई भारतीय नहीं कर पाया था. उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल स्पद्र्धा में 700.5 अंक स्कोर कर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया. अभिनव ने क्वालीफाइंग राउंड में 596 अंक हासिल किए और चौथे स्थान पर रहे. फाइनल राउंड में फिर उन्होंने 104.5 अंक लेकर खिताब अपने नाम किया.

फाइनल राउंड में उन्होंने पहला शॉट 10.7 का लगाया. उनका कोई भी शॉट 10 से नीचे नहीं गया. हालांकि फिनलैंड के हैनरी हैकीनेन और बिंद्रा का स्कोर बराबर रहा, जिससे मुकाबला फाइनल शूटऑफ में पहुंचा. बिंद्रा ने यहां 10.7 का स्कोर किया, जबकि हैनरी 9.7 अंक ही स्कोर कर सके. इस स्पर्द्धा का रजत पदक चीन के झु किनान ने जीता.

2010 राष्ट्रमंडल खेल में भारतीय दल के ध्वजवाहक

ओलंपिक पदक जीतने के बाद बिंद्रा हर खिलाड़ी के आदर्श बन गए. उनकी इस उपलब्धि को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2010 में भारत की मेजबानी में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह में उन्हें ध्वजवाहक चुना गया. साथ ही 71 देशों के करीब सात हजार खिलाड़ियों की ओर से एथलीट्स ऑथ भी उन्होंने ही ली.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भी बिंद्रा ने एक स्वर्ण और एक रजत पदक हासिल किया. गगन नारंग के साथ अभिनव ने 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्द्धा का स्वर्ण पदक जीता. दोनों ने मिलकर 1193 अंक जुटाए और गेम्स रिकॉर्ड कायम किया. यह दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का पहला स्वर्ण पदक भी था. हालांकि व्यक्तिगत स्पर्द्धा में अभिनव रजत पदक ही जीत पाए. उनके हमवतन नारंग ने अपने ही रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए 600 अंक लेकर स्वर्ण पदक जीता.

इसके बाद दोहा के कतर में हुई एशियन शूटिंग चैम्पियनशिप में भी अभिनव स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहे. 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक में हालांकि अभिनव अपना खिताब बचा नहीं पाए, वह क्वालीफाइंग राउंड में निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए 594 अंकों के साथ 16वें स्थान पर रहे. इसी स्पर्द्धा में भारत के गगन नारंग कांस्य पदक जीतने में सफल रहे. हालांकि 2014 में ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में अभिनव ने शानदार वापसी की और स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहे.

2016 रियो डी जिनेरियो ओलंपिक में अभिनव का प्रदर्शन शानदार रहा, लेकिन वह फाइनल राउंड में शूट ऑफ में चूक गए और चौथे स्थान पर रहे. उन्हें शूटऑफ में हराने वाले यूक्रेन के शैरी कुलिश स्पर्द्धा का रजत पदक जीतने में सफल रहे.

अभिनव बिंद्रा का बिजनेस करियर Business Interests of Abhinav Bindra

बिंद्रा अभिनव फ्यूचरिस्टिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं और देश में वॉल्टर आर्म्स के अकेले सप्लायर हैं. उनकी कम्पनी वॉल्टर ब्रांड की पिस्टल देश में सप्लाई करती है. देशभर के कई पुलिस विभाग में उनकी पिस्टल सप्लाई होती हैं. इसके अलावा उनके सैमसंग, बीएसएनएल और सहारा ग्रुप के साथ भी टाईअप रहे हैं.

अभिनव बिंद्रा के बारे में रोचक जानकारियां Intersting Facts about Abhinav Bindra

अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा को भी लोगों ने काफी पसंद किया. अक्टूबर, 2011 में ‘ए शॉट एट हिस्ट्री: माय ओब्सेसिव जर्नी टू ओलंपिक गोल्ड’ नाम से उन पर लिखी गई किताब रिलीज हुई. इसे हार्पर स्पोट्र्स ने पब्लिश किया था जबकि बिंद्रा के साथ लेखक रोहित बृजनाथ ने इसे लिखा था.

बिंद्रा के जीवन पर फिल्म बनने की खबरें भी सामने आई है, जिनमें उनकी भूमिका हर्षवर्धन कपूर निभा सकते हैं.

वर्तमान में वह पुशान जैन के कोच व मेंटर के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

अभिनव बिंद्रा को मिले पुरस्कार एवं उपलब्धियां Achievements & Awards

  • 15 साल की उम्र में 1998 राष्ट्रमंडल खेलों में लिया हिस्सा, सबसे युवा खिलाड़ी बने.
  • 18 साल की उम्र में राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड पाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने.
  • ओलंपिक में व्यक्तिगत स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी.
  • वर्ष 2000 में अर्जुन अवार्ड.
  • वर्ष 2001 में राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड
  • वर्ष 2009 में पद्म भूषण

पदक तालिका

2008, बीजिंग ओलंपिक: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल)
2006, जागरेब विश्व चैम्पियनशिप: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल)
2002, मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेल: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल) टीम स्पर्द्धा
2002, मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेल: रजत पदक (10 मी. एयर राइफल) व्यक्तिगत स्पर्द्धा
2006, मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेल: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल) टीम स्पर्द्धा
2006, मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेल: कांस्य पदक (10 मी. एयर राइफल) व्यक्तिगत स्पर्द्धा
2010, दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल) टीम स्पर्द्धा
2010, दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल: रजत पदक (10 मी. एयर राइफल) व्यक्तिगत स्पर्द्धा
2014, ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल: स्वर्ण पदक (10 मी. एयर राइफल) व्यक्तिगत स्पर्द्धा
2010, ग्वांगझु एशियन गेम्स: रजत पदक (10 मी. एयर राइफल) टीम स्पर्द्धा
2014, इंचियोन एशियन गेम्स: कांस्य पदक (10 मी. एयर राइफल) टीम स्पर्द्धा
2014, इंचियोन एशियन गेम्स: कांस्य पदक (10 मी. एयर राइफल) व्यक्तिगत स्पर्द्धा

अभिनव बिंद्रा के कोट्स – Quotes of Abhinav Bindra

दून स्कूल में पढ़ाई के दौरान हमें किसी एक खेल को चुनना जरूरी था, मैंने निशानेबाजी को चुना. लेकिन धीरे-धीरे मुझे इस खेल से प्यार हो गया.

मुझमें कोई प्रतिभा नहीं है, हां लेकिन मैं नियमित अभ्यास करता हूं और पूरी ईमानदारी और लगन से अपने खेल पर ध्यान केन्द्रित करता हूं.

मेरा एक ही सपना था कि मैं जिला स्तरीय प्रतियोगिता में पदक जीतूं. जिस दिन से मैंने निशानेबाजी का अभ्यास शुरू किया, उस दिन से ही मेरी यही ख्वाहिश थी. उसके बाद जो भी मिला चाहे वह ओलंपिक स्वर्ण पदक ही क्यों न हो, मेरे लालचीपन और खेल के प्रति मेरे प्यार का ही परिणाम है. मेरा मानना है कि ओलंपिक पदक जीतने से ज्यादा खुशी मुझे जिला स्तरीय प्रतियोगिता में पदक जीतने पर हुई थी क्योंकि वह मेरा पहला पदक था.

विजेन्द्र सिंह

विजेन्द्र सिंह बैनीवाल एक भारतीय पेशेवर मुक्केबाज।

करियर

२० अगस्त के दिन कार्लोस गोंगोरा के विरुद्ध कांस्य पदक के लिए प्रदर्शन करते हुए विजेंदर ने बड़ी ही सधी शुरुआत करते हुए ईक्वाडोर के मुक्केबाज़ कार्लोस गोंगोरा को 9-4 से हरा दिया। पहले राउंड में विजेंदर ने सधी हुई मुक्केबाज़ी करते हुए दो अंक जुटाए। दूसरे चक्र में भी वो रुक रुक कर मुक्के लगाते रहे और चार अंक जुटा लिए। तीसरे राउंड में गोंगोरा काफी थके हुए दिखे जिसका फ़ायदा विजेंदर ने उठाया और गोंगोरा को हराने में सफलता प्राप्त की। गोंगोरा को मामूली मुक्केबाज़ नहीं हैं, वे चार बार यूरोपीय चैंपियन रहे हैं।

लेकिन सेमीफाइनल में वह उजबेकिस्तान के अब्बोस अतोयेफ के हाथों 3-7 से पराजित हो गए। मिडल वेट सेमीफाइनल मुकाबले में हार कर भी विजेंदर ने भारत के लिए इतिहास रच दिया है। पहले राउंड में विजेंदर 1-0 से आगे थे लेकिन पूर्व लाइट हेवीवेट विश्व चैपियन अतोयेफ ने शानदार वापसी करते हुए अगले चक्र में पांच अंक जीते, दूसरे चक्र की समाप्ति पर स्कोर हो गया 5-1 तीसरे और आखिरी चक्र में दोनों मुक्केबाज 2-2 से बराबर रहे लेकिन तीसरे चक्र की टक्कर विजेंदर को मैच जीताने में कामयाब साबित नहीं हुई।

खेल उपलब्धियाँ

  • विजेन्द्र सिंह ने वर्ष 2004 के एथेंस ओलम्पिक में सर्वप्रथम भाग लिया, किन्तु वह वेल्टर वेट वर्ग में तुर्की के मुस्तफ़ा कारागोलेयू से 20-25 से पराजित हो गये।
  • राष्ट्रमण्डल खेल वर्ष 2006 में इंग्लैंण्ड के नील पिरकिन्स को सेमीफ़ाइनल में पराजित कर फ़ाइनल में प्रवेश किया, किन्तु दक्षिण अफ़्रीका के बोनगानी मविलासी से पराजित हो गए और कांस्य पदक ही जीत सके।
  • दोहा ओलम्पिक खेल वर्ष 2006 में मुक्केबाज़ी मिडिल वेट वर्ग में कज़ाकिस्तान के बख़्तियार अरतायेव से सेमीफ़ाइनल में 24-29 से पराजित होकर कांस्य पदक जीत सके।

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मैरी कॉम

भारतीय मुक्केबाज़


मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम (एम सी मैरी कॉम) (जन्मः १ मार्च १९८३) जिन्हें मैरी कॉम के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय महिला मुक्केबाज हैं। वे मणिपुर, भारत की मूल निवासी हैं। मैरी कॉम छः बार ‍विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता की विजेता रह चुकी हैं। २०१२ के लंदन ओलम्पिक में उन्होंने काँस्य पदक जीता। 2010 के ऐशियाई खेलों में काँस्य तथा 2014 के एशियाई खेलों में उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया।

दो वर्ष के अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश के बाद उन्होंने वापसी करके लगातार चौथी बार विश्व गैर-व्यावसायिक बॉक्सिंग में स्वर्ण जीता। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर एआइबीए ने उन्हें मॅग्नीफ़िसेन्ट मैरी (प्रतापी मैरी) का संबोधन दिया।

उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनी जिसका प्रदर्शन 2014 में हुआ। इस फिल्म में उनकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई।

प्रारंभिक जीवन और परिवार

मैरी कॉम का जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान के परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी की। आगे की पढाई के लिये वह आदिमजाति हाई स्कूल, इम्फाल गयीं लेकिन परीक्षा में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और फिर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी। मैरी कॉम की रुचि बचपन से ही एथ्लेटिक्स में थी।

उनके मन में बॉक्सिंग का आकर्षण 1999 में उस समय उत्पन्न हुआ जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पो‌र्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग के दांव-पेंच आजमाते देखा। मैरी कॉम बताती है कि

“मैं वह नजारा देख कर स्तब्ध थी। मुझे लगा कि जब वे लड़कियां बॉक्सिंग कर सकती है तो मैं क्यों नहीं?”

साथी मणिपुरी बॉक्सर डिंग्को सिंह की सफलता ने भी उन्हें बॉक्सिंग की ओर आकर्षित किया।

मैरीकॉम की शादी ओन्लर कॉम से हुई है। उनके जुङवाँ बच्चे हैं।

उपलब्धियाँ व पुरस्कार

मैरी कॉम ने सन् 2001 में प्रथम बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। अब तक वह 10 राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी है। बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हे अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया एवं वर्ष 2006 में उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया गया। जुलाई 29, 2009 को वे भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए (मुक्केबाज विजेंदर कुमार तथा पहलवान सुशील कुमार के साथ) चुनीं गयीं। .

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्त्रीत्व को नई परिभाषा देकर अपने शौर्य बल से नए प्रतिमान गढ़ने वाली विश्व प्रसिद्ध मुक्केबाज श्रीमती एमसी मैरी कॉम 17 जून 2018 को वीरांगना सम्मान से विभूषित किया गया। उन्होंने २०१९ के प्रेसिडेंसीयल कप इोंडोनेशिया में 51 किग्रा भार वर्ग में यह स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की एप्रिल फ्रैंक को 5-0 से हराकर यह स्वर्ण पदक जीता।ef>“मैरीकॉम वीरांगना सम्मान से विभूषित”. Naya India Team. 18 June 2018.</ref>नई दिल्ली में आयोजित 10 वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप 24 नवंबर, 2018 को उन्होंने 6 विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली महिला बनकर इतिहास बनाया,

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हिमा दास

एक भारतीय धावक


हिमा दास (असमिया: হিমা দাস) (जन्म 09 जनवरी 2000) एक भारतीय धावक हैं। वो आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हिमा ने 400 मीटर की दौड़ स्पर्धा में 51.46 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता।

अप्रैल 2018 में गोल्ड कोस्ट में खेले गए कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में हिमा दास ने 51.32 सेकेंड में दौर पूरी करते हुए छठवाँ स्थान प्राप्त किया था। तथा 4X400 मीटर स्पर्धा में उन्होंने सातवां स्थान प्राप्त किया था। हाल ही में गुवाहाटी में हुई अंतरराज्यीय चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल अपने जीता था। इसके अलावा 18वें 2018 एशियाई खेल जकार्ता में हिमा दास ने दो दिन में दूसरी बार महिला 400 मीटर में राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़कर रजत पदक जीता है।

2019 में हिमा ने पहला गोल्ड मेडल 2 जुलाई को ‘पोज़नान एथलेटिक्स ग्रांड प्रिक्स’ में 200 मीटर रेस में जीता था. इस रेस को उन्होंने 23.65 सेकंड में पूरा कर गोल्ड जीता था। 7 जुलाई 2019 को पोलैंड में ‘कुटनो एथलेटिक्स मीट’ के दौरान 200 मीटर रेस को हिमा ने 23.97 सेकंड में पूरा करके दूसरा गोल्ड मेडल हासिल किया था। 13 जुलाई 2019 को हिमा ने चेक रिपब्लिक में हुई ‘क्लांदो मेमोरियल एथलेटिक्स’ में महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.43 सेकेंड में पूरा कर फिर से तीसरा गोल्ड मेडल हासिल किया था। 19 साल की हिमा ने बुधवार 17 जुलाई 2019 को चेक रिपब्लिक में आयोजित ‘ताबोर एथलेटिक्स मीट’ के दौरान महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.25 सेकेंड में पूरा कर फिर से चौथा गोल्ड मेडल हासिल किया. इस दौरान हिमा अपने रिकॉर्ड (23.10 सेकंड) के बेहद करीब पहुंच गई थी लेकिन वो इसे तोड़ नहीं पाईं। हिमा ने चेक गणराज्य में ही शनिवार 20 जुलाई 2019 में 400 मीटर की स्पर्धा दौड़ में 52.09 सेकेंड के समय में जीत हासिल की. हिमा का जुलाई मास 2019 में मात्र 19 दिनों के भीतर प्राप्त किया गया यह पांचवां स्वर्ण पदक है.

चेक गणराज्य में आयोजित क्लाड्नो एथलेटिक्स में भाग लेने पहुंचीं हिमा दास ने 17 जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री राहत कोष में राज्य में बाढ़ के लिए अपना आधा वेतन दान कर दिया। इसके अलावा उन्होंने ट्वीट कर बड़ी कंपनियों और व्यक्तियों से भी आगे आकर असम की मदद करने की अपील की।

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बेरोजगारी


जब देश में कार्य करनेवाली जनशक्ति अधिक होती है किंतु काम करने के लिए राजी होते हुए भी बहुतों को प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, तो उस विशेष अवस्था को ‘बेरोजगारी’ (Unemployment) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे व्यक्तियों का जो मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य और इच्छुक हैं परंतु जिन्हें प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, उन्हें ‘बेकार’ कहा जाता है।

व्याख्यासंपादित करें

मजदूरी की दर से तात्पर्य प्रचलित मजदूरी की दर से है और मजदूरी प्राप्त करने की इच्छा का अर्थ प्रचलित मजदूरी की दरों पर कार्य करने की इच्छा है। यदि कोई व्यक्ति उसी समय काम करना चाहे जब प्रचलित मजदूरी की दर पंद्रह रुपए प्रतिदिन हो और उस समय काम करने से इन्कार कर दे, जब प्रचलित मजदूरी बारह रुपए प्रतिदिन हो, ऐसे व्यक्ति को बेकार अथवा बेरोजगारी की अवस्था से त्रस्त नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त ऐसे भी व्यक्ति को बेकार अथवा बेरोजगारी से त्रस्त नहीं कह सकते जो कार्य तो करना चाहता है परंतु बीमारी के कारण कार्य नहीं कर पाता। बालक, रोगी, वृद्ध तथा असहाय लोगों को “रोजगार अयोग्य” (unemployables) तथा साधु, पीर, भिखमंगे तथा कार्य न करनेवाले जमींदार, सामंत आदि व्यक्तियों को पराश्रयी कहा जा सकता है।

कारण एवं भेदसंपादित करें

बेरोजगारी का अस्तित्व श्रम की माँग और उसकी आपूर्ति के बीच स्थिर अनुपात पर निर्भर करता है। बेरोजगारी के दो भेद हैं – असंतुलनात्मक (फ्रिक्शनल) तथा ऐच्छिक (वालंटरी)। असंतुलनात्मक बेरोजगारी श्रम की माँग में परिवर्तन के कारण होती है। ऐच्छिक बेरोजगारी का प्रभाव उस समय होता है जब मजदूर अपनी वास्तविक मजदूरी में कटौती को स्वीकार नहीं करता। समग्रत: बेरोजगारी श्रम की माँग और पूर्ति के बीच असंतुलित स्थिति का प्रतिफल है।

प्रोफेसर जे.एम. कीन्स “अनैच्छिक बेरोजगारी” को भी बेरोजगारी का भेद मानते हैं। “अनैच्छिक बेरोजगारी” की परिभाषा करते हुए उन्होंने लिखा है –

‘जब कोई व्यक्ति प्रचलित वास्तविक मजदूरी से कम वास्तविक मजदूरी पर कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है, चाहे वह कम नकद मजदूरी स्वीकार करने के लिए तैयार न हो, तब इस अवस्था को अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं।’

यदि कोई व्यक्ति किसी उत्पादक व्यवसाय में कार्य करता है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह बेकार नहीं है। ऐसे व्यक्तियों को पूर्णरूपेण रोजगार में लगा हुआ नहीं माना जाता जो आंशिक रूप से ही कार्य में लगे हैं अथवा उच्च कार्य की क्षमता रखते हुए भी निम्न प्रकार के लाभकारी व्यवसायों में कार्य करते हैं।

समस्या निदान के प्रयाससंपादित करें

जापान में बेरोजगारी (१९५३ से २००९ तक)

सन् 1919 ई. में अंतरराष्ट्रीय श्रमसम्मेलन के वाशिंगटन अधिवेशन ने बेरोजगारी अभिसमय (Unemployment convention) संबंधी एक प्रस्ताव स्वीकार किया था जिसमें कहा गया था कि केंद्रीय सत्ता के नियंत्रण में प्रत्येक देश में सरकारी कामदिलाऊ अभिकरण स्थापित किए जाएँ। सन् 1931 ई. में भारत राजकीय श्रम के आयोग (Royal Commission on Labour) ने बेरोजगारी की समस्या पर विचार किया और निष्कर्ष रूप में कहा कि बेरोजगारी की समस्या विकट रूप धारण कर चुकी है। यद्यपि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय श्रमसंघ का “बेरोजगारी संबंधी” समझौता सन् 1921 ई. में स्वीकार कर लिया था परंतु इसके कार्यान्वयन में उसे दो दशक से भी अधिक का समय लग गया।

सन् 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट में बेरोजगारी (बेरोजगारी) प्रांतीय विषय के रूप में ग्रहण की गई। परंतु द्वितीय महायुद्ध समाप्त होने के बाद युद्धरत तथा फैक्टरियों में काम करनेवाले कामगारों को फिर से काम पर लगाने की समस्या उठ खड़ी हुई। 1942-1944 में देश के विभिन्न भागों में कामदिलाऊ कार्यालय खोले गए परंतु कामदिलाऊ कार्यालयों की व्यवस्था के बारे में केंद्रीकरण तथा समन्वय का अनुभव किया गया। अत: एक पुनर्वास तथा नियोजन निदेशालय (Directorate of Resettlement and Employment) की स्थापना की गई है। हम ये रोक सकते हैं।

बेरोजगारी के प्रकारसंपादित करें

  • संरचनात्मक बेरोजगारी : सरचनात्मक बेरोजगारी वह बेरोजगारी है जो अर्थव्यवस्था मे होने वाले संरचनात्मक बदलाव के कारण उत्पन्न होती है।
  • अल्प बेरोजगारी : अल्प बेरोजगारी वह स्थिति होती है जिसमै एक श्रमिक जितना समय काम कर सकता है उससे कम समय वह काम करता है। दूूसरे शब्दो में, वह एक वर्ष मैं कुछ महीने या प्रतिदिन कुछ घंटे बेकार रहता है। अल्प बेरोजगारी के दो प्रकार है-
  • दृष्य अल्प रोजगार: इस स्थिति में, लोगो को सामान्य घन्टों से कम घन्टे काम मिलता है।
  • अदृष्य अल्प रोजगार : इस स्थिति मै, लोग पूरा दिन काम करते हैं पर उनकी आय बहुत कम होती है या उनको ऐसे काम करने पडते हैं जिनमें वे अपनी योग्यता का पूरा उपयोग नहीं कर सकते।
  • खुली बेरोजगारी : उस स्थिति को कह्ते है जिसमे यद्यपि श्रमिक काम करने के लिये उत्सुक है और उसमें काम करने की आवश्यक योग्यता भी है तथापि उसे काम प्राप्त नही होता। वह पूरा समय बेकार रहता है। वह पूरी तरह से परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर आश्रित होता है। ऐसी बेरोजगारी प्राय: कृषि-श्रमिको, शिक्षित व्यक्तियों तथा उन लोगों में पायी जाती है। जो गावों से शहरी हिस्सों में काम की तलाश में आते हैं पर उन को कोई काम नही मिलता। यह बेरोजगारी का नग्न रूप है।
  • मौसमी बेरोजगारी: इसका अर्थ एक व्यक्ति को वर्ष के केवल मौसमी महीनो में काम प्राप्त होता है। भारत में कृषि क्षेत्र में यह आम बात है। इधर बुआई तथा कटाई के मौसमों में अधिक लोगों को काम मिल जाता है किन्तु शेष वर्ष वे बेकार रहते हैं। एक अनुमान के अनुसार, यदि कोई किसान वर्ष मैं केवल एक ही फसल की बुआई करता है तो वह कुछ महिने तक बेकार रहता है। इस स्थिति को मौसमी बेरोजगारी माना जाता है।
  • चक्रीय बेरोजगारी : ऐसी बेरोजगारी तब उत्पन्न होती है जब अर्थव्यवस्था में चक्रीय ऊंच नीच आती है। तेजी, आर्थिक सुस्ती, आर्थिक मंदी तथा पुनरुत्थान चार अवस्थाएं या चक्र है जो एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएं हैं। आर्थिक तेजी की अवस्था में आर्थिक क्रिया उच्च स्तर पर होती है तथा रोजगार का स्तर भी बहुत ऊंचा होता है। जब अर्थव्यवस्था मैं कुल ज़रुरत के घटने की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  • छिपी बेरोजगारी : छिपी बेरोजगारी से पीडित व्यक्ति वह होता है जो ऐसे दिखाई देता है जेसे कि वह काम में लगा हुआ है, परन्तु वास्तव में ऐसा नही होता।